गायत्री ऋग्वेद की प्रार्थना है। यह सूर्य के दिव्य प्रकाश, सवितृ से हमारी बुद्धि को जगाने और दिशा देने की विनती करती है। पूरे भारत में भोर, दोपहर और संध्या को इसका जप होता है।
ॐ भूर्भुवः स्वःतत्सवितुर्वरेण्यंभर्गो देवस्य धीमहिधियो यो नः प्रचोदयात्



ऋग्वेद 3.62.10, तीसरे मंडल में, जिसके सूक्तों के द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र हैं। यह गायत्री छंद में है, जिसकी तीन पंक्तियों में आठ-आठ अक्षर हैं। यह दैनिक संध्या उपासना का हृदय है।
जागृत और निर्मल मन के लिए प्रार्थना
दिव्य प्रकाश से बुद्धि (धी) को जगाने और दिशा देने की प्रार्थना
अध्ययन और काम से पहले मन को स्थिर और शुद्ध करने के लिए इसका जप किया जाता है
वेदों की माता (वेदमाता) और दैनिक संध्या का आधार माना जाता है
श्रद्धा से जप करने वाले के लिए रक्षा-कवच माना जाता है
प्रकाश और जीवन देने वाले सूर्य से रोज़ का जुड़ाव
तीनों संध्याओं में: सूर्योदय, मध्याह्न और सूर्यास्त। भोर का समय सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।
माला पर 108; संक्षिप्त साधना में हर संध्या पर 10 या 28
हाथ-मुँह धोएँ या स्नान करें। फिर सूर्योदय पर पूर्व की ओर, या अन्य समय उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
तीन बार थोड़ा जल पिएँ (आचमन) और श्वास को सहज होने दें।
सस्वर या बहुत धीमे स्वर में (उपांशु) जप करें। हर पंक्ति के बाद थोड़ा ठहरें।
तुलसी या रुद्राक्ष माला पर गिनें। बड़े मेरु मनके को पार करने के बजाय वहीं से माला पलटें।
अंतिम माला के बाद कुछ क्षण शांत बैठें और साधना सवितृ को अर्पित करें।
परंपरा के अनुसार उत्तर, सरल शब्दों में।
एक प्रचलित अर्थ है: “हम दिव्य सवितृ के तेजस्वी प्रकाश का ध्यान करते हैं; वे हमारी बुद्धि को प्रेरित करें।” ॐ के साथ भूः, भुवः और स्वः पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग के नाम हैं।
भोर में 108 जप की एक माला सामान्य अभ्यास है। संक्षिप्त संध्या उपासना में तीनों संध्याओं पर 10 या 28 जप किए जाते हैं। समर्पित साधना में प्रतिदिन 1,008 जप होते हैं। बड़ी संख्या से अधिक नियमित दैनिक जप को महत्व दिया जाता है।
पुरानी परंपरा में यह मंत्र यज्ञोपवीत संस्कार (उपनयन) के समय दिया जाता था। आर्य समाज सहित अनेक आधुनिक शिक्षक और संस्थाएँ इसे श्रद्धा से आने वाले सभी लोगों को सिखाते हैं।
अपना जन्म विवरण भरें और जानें कि परंपरा आपकी कुंडली के लिए कौन से ग्रह मंत्र बताती है, कितनी बार और कब जप करना है। बस एक निःशुल्क खाता चाहिए।